Sunday, 29 June 2025
‘यादों का झरोखा कमल जोशी की खिड़की’विजय भट्ट, वरिष्ठ पत्रकारगढ़वाल के प्रवेश द्वार, कोटद्वार की सबसे व्यस्त गलियों में से एक — गोखले मार्ग। यहाँ दोनों ओर फड़-सब्जी वालों की आवाजें, चहलकदमी और शाम के वक्त खचाखच भरी भीड़ हर पल जीवंतता बिखेरती है। इसी गलियों के बीचोंबीच, एक बड़ा सा भवन है जिसकी एक खिड़की सीधे गोखले मार्ग की ओर खुलती है। उस खिड़की से झंड़ाचौक, लैंसडौन घाटी और उस भीड़-भाड़ भरे शहर के जीवन के रंग दिखते हैं। यह वही खिड़की है जहां से प्रतिभाशाली फोटो जर्नलिस्ट कमल जोशी शहर को देखते थे, अपने कैमरे के लेंस से पहाड़ की कहानियां कहते थे। उस खिड़की पर एक पोस्टर लगा रहता था एक ग्रामीण बालिका की तस्वीर। वह तस्वीर कमल जोशी ने खींची थी, जिसमें एक मासूम बच्ची की आंखों में पहाड़ की कड़वाहट और सपनों का उजाला दोनों झलकते हैं। उस तस्वीर के माध्यम से कमल की खिड़की केवल एक जगह नहीं, बल्कि एक दर्पण बन गई थी जो ग्रामीण जीवन की सच्चाई को शहर के बीचोंबीच लेकर आती थी। लेकिन अब वह खिड़की कम खुलती है। कमल जोशी के जाने के बाद जैसे उस खिड़की के परदे भी थम गए हों। कमल जोशी की फोटोग्राफी केवल तस्वीरें नहीं, बल्कि पहाड़ की मौन भाषा थी उसकी बोलती तस्वीरें। वे सिर्फ एक फोटोग्राफर नहीं थे, बल्कि एक संवेदनशील दृष्टा थे, जो कैमरे के माध्यम से उन अनकहे दर्दों, संघर्षों और खुशियों को दुनिया के सामने लाते थे जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। उनका जीवन एक लंबा सफर था कुमाऊं और गढ़वाल की दुर्गम घाटियों से होते हुए, जहां पैदल यात्राएं, कंधे पर पिठ्ठू, हाथ में कैमरा, उनकी दिनचर्या थी। उनकी तस्वीरों में न केवल पर्वतीय सौंदर्य था, बल्कि उस क्षेत्र के लोगों की आत्मा, उनकी लड़ाई, उनकी अकेलापन, और उनकी सांस्कृतिक विरासत की छवि भी थी।कमल जोशी की तस्वीरों में पहाड़ केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं था, बल्कि एक जीवंत कहानी थी। बर्फ से ढके गांव, अकेली महिलाएं, बच्चों की मासूम मुस्कान, बूढ़े कंधों पर बोझ, और एकांत में बसी पीड़ा हर तस्वीर कुछ कहती थी। वे कैमरे के जरिए ऐसी कहानियां कहते थे, जो शब्दों से कहीं अधिक गहराई लिए होती थीं। कुछ साल पहले उनकी आकस्मिक निधन ने उत्तराखंड को स्तब्ध कर दिया। कमल जोशी न केवल एक फोटोग्राफर थे, बल्कि एक दस्तावेजी रचनाकार, जिन्होंने पहाड़ की सच्चाई को अपनी संवेदनशीलता के साथ कैद किया। उनकी यादें, उनके तस्वीरें, और उनके यात्रा वृत्तांत “चल मेरे पिठ्ठू, दुनिया देखें” आज भी उस धरोहर की गवाही देते हैं जो उन्होंने छोड़ी।कमल जोशी अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी दृष्टि, उनकी संवेदनशीलता और उनकी कला हमेशा उत्तराखंड के आसमान में चमकती रहेगी, कभी किसी बूढ़े पहाड़ी की आँखों में, कभी किसी बच्चे की मुस्कान में, और कभी उन धुंधलाते रास्तों में जहाँ उनके पदचिन्ह आज भी जिंदा हैं। वे पहाड़ की आत्मा थे, जिन्हें उनके कैमरे ने अमर कर दिया।कमल जोशी एक ऐसा नाम है जिसने उत्तराखंड की धरती से उपजे सौंदर्य को कैमरे की नजर से देखा और उसे दुनिया के सामने लाने का बीड़ा उठाया। उनकी घुमक्कड़ी केवल सैर-सपाटे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक वैचारिक यात्रा है जो उन्हें ग्रामीण भारत के दिल की धड़कनों तक ले जाती है। विशेष रूप से उनकी आराकोट-असकोट यात्रा न केवल एक साहसिक अभियान थी, बल्कि ग्रामीण जीवन की सहजता, कठिनाइयों और संस्कृति को जानने-समझने का एक संजीदा प्रयास भी थी। कमल जोशी की फोटोग्राफी किसी प्रोफेशनल लेंस के पीछे छिपी तकनीक मात्र नहीं है, बल्कि उनके अनुभवों, यात्राओं और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है। वे कैमरे के माध्यम से उन हिस्सों को पकड़ते हैं, जो आमतौर पर अनदेखे रह जाते हैं, जैसे पहाड़ी महिलाओं के चेहरे पर झलकता संघर्ष, ग्रामीण बच्चों की आंखों में छिपी जिज्ञासा, या किसी दूरस्थ गांव की धूलभरी पगडंडियों पर चलती ज़िंदगी। उनकी तस्वीरें एक मौन भाषा बोलती हैं, एक ऐसी भाषा जिसमें न प्रकृति चुप है और न ही मनुष्य। आराकोट से असकोट तक की यह पैदल यात्रा उत्तराखंड के दूरस्थ ग्रामीण अंचलों से की गई, जहां आज भी विकास की बयार धीरे चलती है। यह यात्रा न केवल भौगोलिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण है, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। कमल जोशी ने इस यात्रा के माध्यम से उन गांवों को देखा, जहां आज भी लोग पारंपरिक जीवनशैली में जीते हैं, जहां आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार की सुविधा एक सपना है।कमल जोशी एक ऐसा नाम, एक ऐसा व्यक्तित्व थे, जिन्हें एक बार जो भी मिला, वह उन्हें कभी भुला नहीं पाया। उनके भीतर एक आकर्षण, एक अपनापन था, जो हर किसी को उनसे जोड़ देता था। उनकी मधुर स्मृतियां आज भी उनके प्रशंसकों के हृदय में जीवंत हैं। वे जहां भी जाते चाहे किसी छोटे से गांव की गलियों में या किसी चाय की दुकान पर लोग उनके सहज व्यवहार और सरल व्यक्तित्व के मुरीद बन जाते। कमल जोशी न सिर्फ एक संवेदनशील मनुष्य थे, बल्कि एक बेहतरीन छायाकार भी। उन्होंने हिमालय की गोद में बसे गांवों, वहां की जीवनशैली, पर्यावरण, वन्य जीव-जंतुओं और प्रकृति की अद्भुत छवियों को अपने कैमरे में बेहद संवेदनशीलता के साथ कैद किया। उनका कैमरा सिर्फ दृश्य नहीं, भावनाएं भी उतारता था। वर्ष 2014 की प्रसिद्ध नंदा राजजात यात्रा से लौटने के बाद, उन्होंने अपने अनुभवों को एक भावनात्मक यात्रा संस्मरण के रूप में सोशल मीडिया पर साझा किया, जिसका शीर्षक था ‘मेरी अनुष्का भी रहती है हिमालय के उस पार’। इस संस्मरण में एक ग्रामीण युवती की छवि को उन्होंने इतनी आत्मीयता और सौंदर्य के साथ उकेरा कि पाठक उस चरित्र से जुड़ाव महसूस करने लगे। यह रचना न केवल उनकी लेखनी की संवेदनशीलता को दर्शाती है, बल्कि ग्रामीण परिवेश की गहराई से की गई उनकी समझ का प्रमाण भी है। बाद में उनके संस्मरण, कविताएं और लेखों को संकलित कर पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया, जो आज भी उनके चाहने वालों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
एशिया की सबसे बड़ी निजी परिवहन कंपनी ‘जीएमओयू’ पर संकटगढ़वाल मोटर ओनर्स यूनियन लिमिटेड जीएमओयू का नाम सुनते ही गढ़वाल की पहाड़ियों में दौड़ती बसों, घाटियों में गूंजते हॉर्न और सैकड़ों गांवों के जीवन में आए संजीवनी परिवर्तन की तस्वीर सामने आती है। 1943 में स्थापित यह संस्था केवल एक निजी परिवहन कंपनी नहीं, बल्कि गढ़वाल क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक विकास की रीढ़ रही है। दशकों तक जीएमओयू ने उन दूर-दराज के क्षेत्रों को जोड़ा, जहां सरकारी परिवहन की पहुँच सीमित या न के बराबर थी।गढ़वाल की पहाड़ी इलाकों में जीएमओयू की बसें जीवनदायिनी थीं, और इसे एशिया की सबसे बड़ी निजी परिवहन कंपनियों में गिना जाता था। लेकिन दुर्भाग्यवश, समय के साथ कुप्रबंधन, आंतरिक विवाद और भ्रष्टाचार ने इस गौरवशाली संस्था को कमजोर कर दिया। हाल ही में सामने आए 2.5 करोड़ रुपये के घपले ने जीएमओयू की विश्वसनीयता पर गहरा असर डाला है। इस मामले में कंपनी के पूर्व अध्यक्ष सहित नौ कर्मचारियों को गिरफ्तार किया गया है।इस आर्थिक अनियमितता ने जीएमओयू की वित्तीय स्थिति को और अधिक खराब कर दिया है, जिसका सीधा असर सैकड़ों कर्मचारियों और लाखों यात्रियों के जीवन पर पड़ा है, जो इस सेवा पर पूरी तरह निर्भर थे। आज जीएमओयू बंद होने के कगार पर है, कई रूट बंद हो चुके हैं और बसें जंग खा रही हैं। यह केवल एक कंपनी की समस्या नहीं, बल्कि गढ़वाल क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और जनजीवन के लिए गंभीर खतरे की घंटी है।ऐसे में राज्य सरकार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकार को तत्काल प्रभाव से जीएमओयू के पुनरुद्धार के लिए ठोस और पारदर्शी कदम उठाने होंगे। साथ ही, समाज और स्थानीय प्रतिनिधियों को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी, क्योंकि जीएमओयू केवल एक परिवहन सेवा नहीं, बल्कि गढ़वाल की सांस्कृतिक और आर्थिक आत्मा का प्रतीक है। संस्थान की सफलता मजबूत प्रबंधन, पारदर्शिता और जनसेवा की भावना पर निर्भर करती है। यदि समय रहते सुधार न किए गए, तो जीएमओयू जैसी ऐतिहासिक संस्था इतिहास के पन्नों में समा जाएगी। लेकिन अभी भी मौका है कि जीएमओयू को पुनर्जीवित कर गढ़वाल के पहाड़ों की जीवनरेखा के रूप में स्थापित किया जाए। बस ज़रूरत है सही नीयत और स्पष्ट नीति की। कोटद्वार में जीएमओयू का मुख्यालय है, इसके कर्मचारियों की ओर से ही इसको नुकसान पहुंचाने के गंभीर आरोप लगे हैं। जिसमें ढाई करोड़ रुपये के घपले की बात सामने आई है।
Thursday, 16 May 2024
जमीदार उमराव सिंह और सुल्ताना डाकू
कंडी रोड का मौत का कुंआ
कोटद्वार खाम क्षेत्र में अंग्रेजों के जमाने में कभी यह कुंआ कंडी मार्ग के राहगीरों की प्यास बुझाया करता था।भारत स्वतंत्र होने के बाद भारत में खाम क्षेत्र का तहसीलों में बिलय किया गया। नई तहसीले अस्तत्वि में आई और बाद में कंडी मार्ग का क्षेत्र लैंसडौन वन प्रभाग और टाइगर रर्जिव में आ गया। बफर जोन होने के चलते बाद में कंडी मार्ग भी बंद हो गया और।कुमाउऊं और गढ़ावाल की सांस्कृतिक दूरियां भी बढ़ गई। अग्रेंजों के जमाने में बना यह कुंआ आज भी मौजूद है। लेकिन अब कंडी में पर राहगीर नहीं।सह कुंआ अब जंगली जानवरों के लिए मौत का कुआ बनकर रह गया।इसके बाद न ही वन विभाग ने कुंआ बंद करने की हिमाकत की और न ही कोई अन्य। कई वन्य जीव इस कुंए में गिए कर अपनी जीवन लीला सामाप्त कर गए है।
Saturday, 17 April 2021
"कालीमठ मंदिर में खून की नदी देख दहल गया था गबर सिंह का दिल"विजय भट्ट, वरिष्ठ पत्रकाररुद्रप्रयाग जिले के केदारखंड में मां मंदाकिनी के तट पर स्थित सिद्धपीठ कालीमठ मंदिर में कुछ समय पूर्व तक मन्नतें पूरी होने पर लोग बड़ी संख्या में जानवरों की बलि देते थे। जिसमें बकरी और भैंसा शामिल था। मंदिर के पास प्रतिदिन बेजुबान जानवरों की खून की नदी बहती थी और खून पास बह रही मंदाकिनी नदी में मिल जाता था। अस्सी के दशक में यह देख स्थानीय निवासी गबर सिंह राणा का मन विचलित हुआ और उन्होंने मंदिर में सबसे पहले बलि प्रथा का विरोध किया। गबर सिंह राणा के बलि प्रथा के विरोध करने पर उन्हें लोगों का भारी आक्रोश झेलना पड़ा। यहां तक कई बार लोगों ने उनके साथ मारपीट भी की उनका माइक तोड़ डाला। उन पर मुकदमा भी किया। कई साल तक उनपर हाईकोर्ट में वाद भी चला। लेकिन उन्होंने बलिप्रथा का विरोध करना नहीं छोड़ा। अस्सी वर्षीय गब्बर सिंह राणा बताते हैं कि करीब अस्सी के दशक में उन्होंने कालीमठ मंदिर से बलि प्रथा का विरोध शुरू किया था। इसके बाद उन्होंने पौड़ी के बूंखाल और अन्य मंदिरों में भी जाकर इसका विरोध किया। एक बार पशु बलि के विरोध में उन्होंने खुद की गर्दन ही आगे कर दी थी। आक्रोशित लोगों ने उनकी गर्दन पर ही हथियार रख लिया था। लेकिन उनकी मेहतन रंग लाई और धीरे-धीरे सरकार ने बलि प्रथा को मंदिरों से बंद कर दिया। आज बूंखाल और कालीमंठ में बलि प्रथा पर रोक है। देवभूमि में जहां लोग आस्था के नाम पर कुछ भी सहन नहीं करते हैं, ऐसे में करीब चालीस साल पहले कालीमठ मंदिर में बलि प्रथा के खिलाफ गबर सिंह राणा ने सबसे पहले आवाज उठाई। गब्बर सिंह बताते हैं कि मंदिर में भैंसे काटने के बाद वहां भारी मात्रा में खून जमा हो जाता था।साथ ही पशुओं के अवशेष भी आसपास भी डाले रहते थे। मंदिर के पास खून की बदबू से बहुत परेशानी होती थी। बकरी का मांस तो लोग खा जाते थे, लेकिन भैंस का मांस मारने के बाद किसी काम नहीं आता था। इसको लेकर उन्होंने कालीमठ मंदिर से ही सबसे पहले बलि प्रथा का विरोध शुरू किया। शुरूवाती दौर में लोगों ने इसका भारी विरोध किया। उनका यह अभियान आजीवन चलता रहा। अब वह अपने नाम के आगे ब्रती बाबा लगाते हैं। या सत्यब्रती कहते हैं। उन्होंने कालीमठ के पास ही अपना आश्रम भी बना रहा है। कालीमठ के दो किमी पहले ही बेडुला उनका गांव है। उत्तराखंड में बलि प्रथा के विरोध में आवाज उठाने वाले गबर सिंह राणा आज गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं। इस सामाजिक बुराई के खिलाफ आवाज उठाने वाले गब्बर सिंह को कोई सम्मान आज तक नहीं मिल पाया।कुछ समय पूर्व सड़क हादसे में उनके पांच में गभीर चोट आ गई थी। जिसके बाद उनका पांच भी काटना पड़ा। लेकिन देवभूमि में निरजीव जानवरों खासकर जीनका मारने के बाद कोई उपयोग नहीं है, के खिलाफ आवाज उठाने वाले गब्बर सिंह की पहल सराहनीय है। आज कालीमठ मंदिर में शुद्ध रूप से पूजा पाठ होता है। लोगों की आस्था आज भी उतनी ही है, लेकिन मंदिर में अब बलिप्रथा पूर्ण रूप से बंद हो गई है। किसी समय मंदिर में एक ही दिन में कई जानवरों की बलि दी जाती थी।सिद्धपीठ और रहस्यमयी कालीमठ मंदिर रुद्रप्रयाग जिले के केदारनाथ हाईवे पर गुप्तकाशी से पहले कालीमठ के लिए सड़क कट जाती है। करीब बीस किमी आगे मंदाकिनी के किनारे चलते हुए सिद्धपीठ कालीमठ मंदिर है। पहले यहां बलि प्रथा दी जाती थी लेकिन अब इसमें नवरात्रों में विशेष पूजा होती है। यहीं से कालीशिल्ला के लिए भी रास्ता निकलता है। कालीमठ में तीन अलग-अलग भव्य मंदिर है जहां मां काली के साथ माता लक्ष्मी और मां सरस्वती की पूजा की जाती है। कालीमठ में सुंदर नकाशीदार मंदिर और स्थापत्य कला के दर्शन भी होते हैं। पास ही मंदाकिनी नदी बह रही है। कालीमठ मंदिर के बारे में कई रहस्यमयी कथाए भी प्रचलित हैं। माना जाता है कि मां काली इस कुंड में समाई हुई हैं। तब से ही इस स्थान पर मां काली की पूजा की जाती है। बाद में आदि शंकराचार्य ने कालीमठ मंदिर की पुनर्स्थापना की थी। मंदिर के नजदीक ही कालीशीला भी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसी शीला पर माता काली ने दानव रक्तबीज का वध किया था।--------------------------------------फोटो कालीमठ मंदिर(फाइल फोटो)फोटो बलि प्रथा के विरोधी गब्बर सिंह
Monday, 12 October 2020
गढ़वाल की अनोखी विलुप्त होती परंपरा "डड्वार"
Sunday, 16 August 2020
##वैश्विक महामारी कोरोना और इसके साइड इफेक्ट##
Friday, 31 July 2020
कमल जोशी के कैमरे में कैद हिमालयी संस्कृति
Saturday, 18 July 2020
"शहीदों की निशानियों पर बदहाली की धूल" - Himantar
Friday, 17 July 2020
"आजाद" का प्रशिक्षण स्थल ही उपेक्षित!
"शहीदों की निशानियों पर बदहाली की धूल"
Friday, 12 June 2020
देश का नामदेव स्थल ''कण्वाश्रम'' ही उपेक्षित
''खाम स्टेट और अंग्रेजों के जमाने का कुंआ''
Wednesday, 8 November 2017
सांकेतिक मुद्रा से कैशलेस का सफर
भातर में 1325 ईवीं से पहले वस्तु विनिमय था। लोग मुद्रा के बारे में नही जानते थे। सबसे पहले गयासुद्दीन तुगलक ने सांकेतिक मुद्रा चलाई। लोग इसे नही समझ पाए। ना ही सुल्तान लोगों को समझा पाया। लोगो ने उसे पागल सुल्लान करार दिया। लेकिन भारत में सांकेतिक मुद्रा का वास्विक जनक तुगलक ही है। 14वी शताब्दी से 21वीं शताब्दी तक का भारतीय मुद्रा के शफर को देखें तो। विमुद्रीकरण आरबीआई टकसाल योजना आयोग बैंकिग और कैशलेस के बारे में जानना जरूरी है। कैसलेस भी ठीक उसी तरह है जिस तरह वस्तुविनमय के जमाने में सांकेतिक मुद्रा का परचलन। लेकिन सुल्लतान जनता का विरोध नही झेल पाया और कोई ठोस नीति नहीं बना पाया। जिस कारण लोगों ने घर घर टकसाल खोल दी। बाजार में रुपये ही रुपये हो गए। ठीक इसी प्रकार नोटबंदी कैशलेस के बारे में भी पहले योजना बनानी होगी तभी इसमें सफलता मिल सकती है।
Wednesday, 6 September 2017
रोहिंग्या मुस्लिमों के लिए दुनियां के दरवाजे बंद
म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों पर जुल्म होने से वहां पर बडी संख्या में पलायन हो रहा है। लेकिन इस पलायन से न सिर्फ भारत बल्कि एशिया के अन्य देश भी प्रभावित हैं। सभी पडोसी देशों ने रोहिंग्या मुस्लिम के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए।अब भारत सरकार भी भारत में रह रहे करीब चालीस हजार रोहिंग्यों को बाहर करने की सोच रही है। क्योंकि हाल में ही रोहिंग्यों ने म्यामांर में सुरक्षा कर्मियों के कैंप पर हमला किया है। पिछली जनगणना कि रिपोर्ट के अनुसार भारत की 125 करोड की आबादी में 20.20 करोड हिन्दुओं के पास ही अपने घर हैं। 3.12 करोड मुस्लिम दूसरे स्थान पर हैं। ऐसे में सर्णाथियों की समस्या बडी है। पहले भी बांग्लादेशी तिब्बती सोमालिया नेपाल के लोग भारत में सरण ले चुके हैं। भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि दुनिया हमें मानवाधिकारों के बारे में न सिखाए। भारत की सुरक्षा भी रोहिंग्यों से जुडी है। ऐसे में मोदी के दौरे से रोहिंग्यों की उम्मीद बंधी है।

